सागर/ एरण अभिलेख मध्य प्रदेश के सागर जिले के बीना में स्थित एरण नामक पुरातात्विक स्थल से प्राप्त कई महत्वपूर्ण शिलालेखों का समूह है, जिनमें भानुगुप्त के सती स्तंभ लेख (510 ई.) से सती प्रथा का पहला लिखित प्रमाण मिलता है, और समुद्रगुप्त के अभिलेख से गुप्तकाल में एरण के महत्व और उनकी सैन्य शक्ति का पता चलता है, जबकि तोरमाण का वराह प्रतिमा पर अंकित अभिलेख हूणों और वैष्णव धर्म के विकास को दर्शाता है, जिससे यह गुप्त और पूर्व-गुप्त काल के इतिहास, प्रशासन, धर्म और समाज को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
भानुगुप्त का सती स्तंभ लेख (510 ई.) भारत में सती प्रथा का पहला पुरातात्विक प्रमाण है। इसमें गुप्त शासक भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी के सती होने का उल्लेख है।
समुद्रगुप्त का अभिलेख एरण को एरकिण कहता है और कोलकाता संग्रहालय में सुरक्षित है। इससे पता चलता है कि एरण गुप्तों की एक महत्वपूर्ण सैन्य छावनी और श्स्वभोग नगरश् (अपनी निजी संपत्ति का नगर) था, जहाँ समुद्रगुप्त अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ रहे थे।
तोरमाण का वराह प्रतिमा अभिलेख (लगभग 510 ई.) एक वराह (सूअर) प्रतिमा पर उत्कीर्ण है, जो विष्णु का अवतार है। यह हूण शासक तोरमाण द्वारा मालवा पर शासन करने और धन्यविष्णु द्वारा विष्णु को मंदिर समर्पित करने का उल्लेख करता है, जो उस समय वैष्णव धर्म के प्रभाव को दर्शाता है।
बुधगुप्त का अभिलेख यह बताता है कि बुद्धगुप्त के अधीन यमुना और नर्मदा के बीच के क्षेत्र में महाराज सुरश्मिचन्द्र शासन कर रहे थे, जिससे पूर्वी मालवा पर उनके नियंत्रण का पता चलता है।
एरण का ऐतिहासिक महत्व
गुप्त साम्राज्य के अधीन एरकिण (एरण) एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र या राजधानी थी। यहाँ विष्णु मंदिर, नरसिंह और वराह प्रतिमाएँ मिली हैं, जो गुप्तकालीन वैष्णव धर्म के विकास को दर्शाती हैं। यहाँ से प्राप्त सिक्के बताते हैं कि एरण प्राचीन भारत की टकसालों (सिक्के बनाने के स्थान) में से एक था। यहाँ से नाग शासकों और शक शासकों के सिक्के व साक्ष्य भी मिले हैं, जो यहाँ के बहु-शासकीय इतिहास को दर्शाते हैं।
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