भोपाल / मध्यप्रदेश के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों में जैव-विविधता को समृद्ध करने और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाने के लिए बड़े शाकाहारी वन्यजीवों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार के ऐतिहासिक प्रयास रंग लाने लगे हैं। राज्य के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 'गौर' (इंडियन बायसन) का कुनबा तेजी से फल-फूल रहा है, वहीं कान्हा टाइगर रिजर्व में विलुप्तप्राय 'वन भैंसे' (वाइल्ड बफेलो) को पुनः बसाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम जारी है।
पर्यावरणविदों के अनुसार, ये बड़े शाकाहारी जीव केवल जंगल की शोभा ही नहीं बढ़ाते, बल्कि वे प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में एक "इकोसिस्टम इंजीनियर" की भूमिका भी निभाते हैं।
बांधवगढ़ में गौर की वापसी: 1998 में हुए थे विलुप्त, अब संख्या 240 के पार
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय ने बताया कि गौर (एशिया का सबसे बड़ा जंगली गौवंश) वर्ष 1998 में बांधवगढ़ क्षेत्र से पूरी तरह विलुप्त हो गया था। इसके बाद पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने के लिए वर्ष 2011-12 में कान्हा से 50 गौर लाकर यहाँ पुनः स्थापित किए गए, जिनकी आबादी बढ़कर करीब 170 तक पहुँच गई।
आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को मजबूती देने के उद्देश्य से सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से 50 अतिरिक्त गौर लाने का लक्ष्य तय किया गया:
पहला चरण (फरवरी 2025): 23 गौर (18 मादा, 5 नर) लाए गए।
दूसरा चरण (जनवरी 2026): 27 गौर (22 मादा, 5 नर) का स्थानांतरण पूरा किया गया।
इन सभी वन्यजीवों की निगरानी के लिए वीएचएफ कॉलर (VHF Collar), हॉर्न स्लीव और ईयर टैग लगाए गए हैं। वर्तमान में बांधवगढ़ लैंडस्केप में गौर की कुल संख्या 220 से 240 के बीच पहुँच चुकी है।
कान्हा में वन भैंसा पुनर्स्थापना: 3 वर्षों में 50 वन भैंसे लाने का लक्ष्य
कान्हा टाइगर रिजर्व के उप संचालक पी.के. वर्मा के अनुसार, कान्हा में वन भैंसों को पुनः स्थापित करने के लिए 3 वर्षों में 50 वन भैंसे लाने का खाका तैयार किया गया है।
शुरुआत (28 अप्रैल 2026): वन भैंसों की पहली खेप कान्हा पहुँची।
वर्तमान स्थिति: दो चरणों में 4-4 की संख्या में कुल 8 वन भैंसे कान्हा लाए जा चुके हैं।
प्रारंभिक चरण में इन्हें विशेष रूप से निर्मित बाड़ों में रखा जा रहा है। कुनबा बढ़ने पर इन्हें चरणबद्ध तरीके से खुले प्राकृतिक रहवास में छोड़ा जाएगा।
गौर और वन भैंसा: अंतर और प्राकृतिक विशेषताएँ
यद्यपि गौर और वन भैंसा दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, परंतु दोनों में प्रजाति और शारीरिक बनावट का बड़ा अंतर है:
| लक्षण / विशेषता | गौर (Indian Bison) | वन भैंसा (Wild Buffalo) |
| वंश (Family) | गौवंश (Bovine) | भैंस वंश (Bubaline) |
| शारीरिक बनावट | विशालकाय शरीर, कंधे पर स्पष्ट कूबड़ | अपेक्षाकृत छोटा शरीर, स्पष्ट कूबड़ का अभाव |
| पहचान | पीले-सफेद निचले पैर (मोज़े जैसी बनावट) व घुमावदार सींग | चौड़े और फैले हुए सींग |
| आवास (Habitat) | घने जंगल और पहाड़ी ढलान | दलदली क्षेत्र, गीले घास के मैदान और जल स्रोत |
| खान-पान | कोमल घास, पत्तियाँ और वनस्पतियाँ | कठोर एवं अत्यधिक ऊंची दलदली घास |
क्यों कहे जाते हैं ‘जंगल के प्राकृतिक इंजीनियर’?
गौर और वन भैंसे जैसे विशाल शाकाहारी वन्यजीव जंगल के वनस्पति चक्र को संचालित करने में अहम भूमिका निभाते हैं:
घास का नियंत्रण: ये जीव जंगलों में उगने वाली अत्यधिक ऊंची और कठोर घास को खाकर उसे नियंत्रित रखते हैं।
छोटे जीवों को भोजन: ऊंची घास छंटने से जमीन तक धूप पहुँचती है, जिससे नई और कोमल घास उगती है। यह कोमल घास चीतल, सांभर और हिरणों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत बनती है।
आवास निर्माण: जलस्रोतों के आसपास की ऊंची वनस्पतियों को नियंत्रित कर ये दलदली तंत्र को स्वच्छ और अन्य जीवों के रहने योग्य बनाते हैं।
इन दोनों प्रजातियों के सफल संरक्षण से मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों की जैव-विविधता और खाद्य-श्रृंखला को अभूतपूर्व मजबूती मिलना तय है।

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