● बुंदेलों और मराठों का 400 साल पुराना गणेश मंदिर
● 35 साल में बना अष्टकोणीय मंदिर
● 6 पीढ़ियों से एक परिवार कर रहा सेवा
सागर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित मराठों और बुंदेलों की संस्कृति का संगम। सागर जिले की लखाबंजारा झील पर स्थित है यह अष्टकोणीय स्वयंभू गणेश का मंदिर।
बाजीराव मस्तानी फ़िल्म में हमने मराठाओं और बुंदेलों की दोस्ती देखी है। बुंदेलखंड की धरती पर महाराज छत्रसाल की चिट्ठी मिलते ही तीर की तेजी से पेशवा बाजीराव आये और आतताइयों से घिरे महाराज छत्रसाल को उबारकर मित्रता का परिचय दिया। बुंदेलखंड में कई स्थानों पर मराठाओं के शौर्य का इतिहास मिलता है। सागर जिले में भी उस दौर का इतिहास किलों और मंदिरों के रूप में आज भी मौजूद है। सतत्तर साल के गोविंद दत्तात्रेय अठावले इस मंदिर के पुजारियों की छठवी पीढ़ी के पूजारी हैं। जो आज भी यहां मौजूद गणेश मंदिर की पूजा कर रहे हैं। उन्होंने बताया सन 1600 में यहाँ खुदाई के दौरान भगवान गणेश की यह मूर्ती मिली थी। इसीलिए इन्हें स्वयंभू गणेश भी कहा जाता है। पूरे पैंतीस साल में महाराष्ट्र के कारीगरों ने 1640 में इस मंदिर को बनाकर तैयार किया। ये वो दौर था जब शिवाजी महाराज का परचम लहराया करता था। इसके बाद मराठाकाल में बाजीराव के साम्राज्य में इस मंदिर का स्वर्णिम दौर रहा। जहां बुंदेलों और मराठाओं का इतिहास लिखा गया जो नागपुर में आज भी सुरक्षित है। जहां औरंगजेब से महाराजा छत्रसाल की विजय के गौरवगाथा लिखी गयी। उसी बुंदेलखंड का यह मंदिर एक प्राचीन धरोहर है। वर्षों पुराना यह मंदिर शिवाजी कालीन है। प्राचीन अष्टकोण के मंदिर को भारत का दूसरा गणेश मंदिर भी कहा जाता है, जहां के गर्भ गृह का निर्माण आठ कोणों में हुआ है। इसी पद्धति पर सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई का भी निर्माण हुआ है। सागर किले में रहने वाले मराठा शासकों की तस्वीरें किले में आज भी मौजूद है जो अब जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी के रूप में जाना जाता है। चार सौ साल बाद भी मराठा गणेश महादेव मंदिर ने अपनी भव्यता बनाकर रखी है। मंदिर में लगे संस्कृत अभिलेख में मराठा शासकों द्वारा इसकी स्थापना का उल्लेख है। परिसर में 350 साल पुराना राधाकृष्ण जी का भी प्राचीन मंदिर है।
● शिवलिंग पर बना है चंद्रमा
यहां के शिवलिंग के बारे में पुजारी ने बताया कि उस दौर में मुगल काल के दौरान रामेश्वरं से यह शिलिंग यहां लाकर स्थापित किया गया। जिस पर भगवान शिव की जटाओं की तरह ही चंद्रमा विद्यमान है। 21 बैलगाड़ियों से मराठा इसे लेकर आये जिसमें महीनों का वक़्त लगा था।

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