दशहरा का विशेष महत्व, सागर के महालक्ष्मी मंदिर एवं महाराष्ट्र की कोल्हापुर वाली मां महालक्ष्मी की लगभग 300 साल पहले एक साथ हुए थी स्थापना


सागर का लक्ष्मीपुर स्थित 300 साल पुराना महालक्ष्मी मंदिर जिसका दशहरे पर विशेष महत्व है । जोकि आम दिनों की अपेक्षा दशहरा वाले दिन सुबह से लेकर शाम तक खुला रहता है । दशहरे के दिन दूर-दूर के लोग यहां माता के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं । यह खास मंदिर लगभग 300 साल पहले मराठाओं ने बनवाया था । सागर का विस्तार करने का श्रेय मराठाओं के लिए जाता है। 17वीं शताब्दी में मराठाओं का बुंदेलखंड में आगमन होने के बाद यहां पर कई ऐतिहासिक इमारतें बनाई गई । जिसमें लक्ष्मीपुर स्थित सूबेदार वाड़ा एवं बाड़े के बीच में स्थित लक्ष्मी मंदिर है । इसी मंदिर के सामने स्थित सुंदर पानी की बावड़ी जिसे वस्तु के अनुसार बनाया गया है जिसे चोपड़ा कहते हैं, जो आज भी मौजूद हैं । 
             महालक्ष्मी मंदिर को लेकर कहा जाता है कि महाराष्ट्र की कोल्हापुर और सागर के इस मंदिर में एक साथ ही प्रतिमा की स्थापना की गई थी । दोनों ही जगह पर मंदिर और प्रतिमाएं समान हैं, यहां तक की प्रतिमाओं में एक जैसे पत्थर का भी इस्तेमाल किया गया है । अंतर केवल इतना है कि कोल्हापुर की महालक्ष्मी काले पत्थर की है और सागर की महालक्ष्मी सफेद पत्थर से बनी हुई है । यह मंदिर आज भी मराठी परिवार के पजेशन में है और सूभेदार परिवार के द्वारा महालक्ष्मी की सेवा की जाती है । यह मंदिर आम दोनों में सुबह शाम ही खुलता है, लेकिन दशहरे पर सुबह से लेकर शाम तक खुला रहता है । 

         दशहरे के दिन पूजन की बात करें तो महालक्ष्मी माता को शमी के पात्र चढ़ाना बेहद शुभ माना जाता है । यहां पर करीब 300 साल पुराना शमी का पेड़ भी है, जिसका पूजन करने और परिक्रमा करने के बाद पत्तियां लेकर लोग महालक्ष्मी मंदिर पहुंचकर माता को चढ़ाते हैं । कुछ लोग पत्तियां लेकर अपने घर ले आते हैं और तिजोरी में रखते हैं. इन पत्तियों को सोने के समान माना गया है और तिजोरी में रखने से धन वैभव बढ़ता है, महालक्ष्मी की कृपा आशीर्वाद बना रहता है । 


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